ईंट भट्ठों पर सिसक रहा बचपन, शिक्षा के अधिकार से वंचित मजदूरों के बच्चे

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(दीपेश गुप्ता)
सुरीर मथुरा 21 दिसंबर।
ईंट भट्ठों पर हजारों मासूमों का बचपन पढ़ाई-लिखाई की बजाय दुधमुंहे भाई-बहनों की देखभाल एवं मजदूरी कर रहे माता-पिता का हाथ बँटाने में बीत रहा है। इस माहौल में पल बढ़ रहे मजदूरों के इन बच्चों का दर्द जिम्मेदारों को दिखाई नहीं दे रहा है।

दरअसल तंगहाल और गरीब मजदूरों की अपने बीबी बच्चों की परवरिश के लिए सैकड़ों किमी दूर छतीसगढ़, पश्चिमी बंगाल, झारखंड, बिहार आदि स्थानों से आकर ईंट भट्ठों पर मजदूरी की विवशता बन गयी है। जहां हाड़-तोड़ मेहनत करने वाले मजदूर अपने बुढ़ापे की लाठी को यूं ही कमजोर कर रहे हैं। इनके नौनिहालों की परवरिश ऐसे माहौल में हो रही है, जहां पढाई तो दूर रहने-सहने की भी व्यवस्था ठीक नहीं है। सर्दी और गर्मी के मौसम में भट्ठा संचालकों द्वारा उपलब्ध कराई गई कच्ची-पक्की झुग्गियों में ही रहने को विवश हैं। जहां उनके बच्चों की अपने दूधमुंहे भाई-बहनों को संभालने के अलावा चौका-चूल्हा और मजदूरी के कार्य में माता-पिता का हाथ बँटाने का कार्य उनकी दिनचर्या में शुमार है। जनपद के सुरीर, नौहझील, शेरगढ़ एवं कोसीकलां क्षेत्र में स्थापित करीब दो सौ ईट भट्ठों पर इस स्थिति को कभी भी खुली आंखों से देखा जा सकता है।

मुफलिसी में अपने पेट की खातिर खुले आसमान के नीचे घुमंतू की तरह झुग्गियों में रह रहे मजदूरों के बच्चों की स्थिति न तो सामाजिक कार्यकर्ताओं को दिख रही है और न ही शासन-प्रशासन की इन तक नजर पहुंच रही है, जिससे हजारों बच्चों का बचपन ईंट भट्ठों पर सिसक रहा है।

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