पुण्यतिथि पर भावपूर्ण स्मरण : मथुरा की शान थे प्रोफेसर रामप्रसाद कमल

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पुण्यतिथि पर भावपूर्ण स्मरण : मथुरा की शान थे प्रोफेसर रामप्रसाद कमल

योगेश खत्री
मथुरा 4 जनवरी 2018 ।
उत्तर प्रदेश सरकार के पूर्व लोक निर्माण राज्य मंत्री प्रोफेसर रामप्रसाद कमल कि आज पुण्यतिथि है। प्रोफेसर कमल का 4 जनवरी 2015 को 84 वर्ष की अवस्था में निधन हो गया था।

अपने आम जीवन में कमल साहब के नाम से मशहूर प्रोफेसर राम प्रसाद भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता थे। लेकिन अन्य सभी राजनैतिक दलों के लोग भी उनका पूरा सम्मान करते थे। उनका किसी से बैरभाव नहीं था और कोई उनसे बैरभाव नहीं रखता था। एक तरह से वह अजातशत्रु थे।

मथुरा की तो वह शान थे। सरलता और सादगी की प्रतिमूर्ति थे। आत्मीयता उनमें कूट-कूट कर भरी थी। मथुरा के जितने भी प्रसिद्ध राजनेता हैं, चाहे वे श्याम सुंदर शर्मा हों या लक्ष्मीनारायण चौधरी या सरदार सिंह आदि सभी उन्हें गुरूजी कहकर संबोधित करते थे।

उनका आत्मीयता का भाव इस तरह से याद आता है कि एक बार हमारा लखनऊ जाना हुआ। कैलाश सर ने ETV भेजा था। सन् 2002 की बात है। महीना अप्रैल से जून के मध्य का रहा होगा। तब ETV खुला ही था, उसके मथुरा के संवाददाता के रूप में एनके सिंह जी ने मुझे हरी झंडी भी दे दी थी, जिनसे मिलने मैं चैनल के माल एवेन्यू कार्यालय गया था। बराबर में ही मायावती का बंगला था। यह बात और है कि मैंने ETV जॉइन नहीं किया और उन्हीं के पास रहा, जिन्होंने मुझे लखनऊ भेजा था या यह कहूं तो गलत न होगा कि खुद ही लखनऊ के लिए स्टेशन भी छोड़कर आए थे।

खैर, माल एवेन्यू से निकलकर सड़क पर चहल कदमी करते हुए मैं आगे बढ़ रहा था। नवाबी शहर को भी देख रहा था। समय मेरे पास काफी था। गाड़ी में कुछ घंटे थे। इसलिए चिंता की कोई बात नहीं थी। पैदल ही भ्रमणशील था। इसी मध्य देखता हूँ कि सायरन बजाती हुई लाल बत्ती लगी एंबेसडर कार और उसके आगे पीछे 1-2 अन्य गाड़ियां आकर अचानक मेरे पास रुकती हैं। अंबेसडर में कमल साहब थे। वह शीशा खोलते हुए बोले – चलो। मैंने पूछा – कहाँ ? बोले – मथुरा और कहाँ ? मैंने कहा नहीं मेरी टिकट है। मैं ट्रेन से ही आऊँगा। मन में यह भाव था कि जब समय है तो क्यों ना थोड़ा सा अपनी राजधानी को ही देखा जाए ? फिर कमल साहब का काफिला चला गया। ऐसे थे कमल साहब। ऐसी थी उनकी आत्मीयता।

प्रोफेसर राम प्रसाद कमल के बारे में कुछ भी कहना सूरज को दीया दिखाने के समान है। ऐसे बिरले ही लोग होते हैं, जिनके जाने के बाद भी उनकी याद चिरस्थायी रूप से बनी रहती है। ऐसी ही शख्सियत थे कमल साहब जिन्हें लेकर एक शेर याद आता है…

यूँ तो दुनिया में सभी आते हैं जाने के लिए,
मौत उसकी है करे जिसका जमाना अफसोस।

छगनपुरा कोतवाली रोड स्थित अपने आवास पर जब कभी शाम को उनसे मिला तो वे गुनगुना पानी पिलवाया करते थे। कहते थे कि दिनभर की दौड़-धूप के बाद एक गिलास गुनगुना पानी जरूर पीना चाहिए इसके तमाम फायदे हैं।

कमल साहब 1980 में भारतीय जनता पार्टी में आए और 1992 से लगातार दो बार विधान परिषद सदस्य मनोनीत किए गए। वह विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। बीएसए कॉलेज की लॉ डिपार्टमेंट के वे हैड रहे और आगरा विश्वविद्यालय के विधि विभाग के डीन भी।

उच्च कक्षाओं की क्लासेज में दबंग छात्र भी होते हैं। साथी प्रोफेसर्स को वह शिक्षा देते थे कि जब कभी कोई दबंग छात्र दबंगई दिखाए तो उसके सामने किसी कमजोर छात्र के साथ उठापटक कर दो क्योंकि यदि आप दबंग के साथ दबंगई दिखाओगे तो मुसीबत खड़ी हो जाएगी। लेकिन जब आप अपनी कड़ाई कमजोर पर दिखाओगे तो दबंग अपने आप फिट हो जाएगा। यह उनकी अपनी तकनीकी थी।

भारतीय जनता पार्टी में आने से पूर्व कमल साहब दो बार नगर पालिका के निर्दलीय सभासद भी रहे। 1997 से 2004 के मध्य राज्य में भाजपा सरकार के समय वे लोक निर्माण राज्य मंत्री रहे। उनके दो पुत्र हैं भारत भूषण और भुवन भूषण। भारत भूषण अभी 3 अक्टूबर 2017 को ही हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति पद से सेवानिवृत्त हुए हैं, वही उनके छोटे पुत्र भुवन भूषण उर्फ लकी कमल भाजपा के प्रदेश कार्यसमिति सदस्य हैं और पेशे से वकील।

लकी कमल के अनुसार सभी पार्टियों के प्रमुख नेता उनसे बराबर का स्नेह रखते थे। चौधरी चरण सिंह, बाबू जगजीवन राम, मुलायम सिंह यादव, शिवपाल यादव और मायावती आदि सभी उन्हें सम्मान देते थे। अटल बिहारी वाजपेयी के तो वे कानपुर के DAV कॉलेज में साथ पढ़े थे। नरेंद्र मोदी भी उन्हें चाहे जब कॉल करके अपने पास बुला लिया करते थे। पिछले लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी जब मथुरा आए थे तो उन्होंने उनसे कहा था कि सरकार बनने वाली है, दिल्ली आओ मगर वे दिल्ली ही नहीं जा पाए।

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