128 वर्ष पूर्व बना कासगंज नदरई झाल का पुल हादसे के मुँहाने पर 

जिलाधिकारी आरपी सिंह ने भारी वाहनों के निकलने पर लगाया प्रतिबंध, दुनिया में झाल के पुल के नाम से जाना पहचाना जाता है नदरई का पुल, नीचे काली नदी और ऊपर से बह रही है कैनाल नहर में दरारें पड़ने से डीएम ने लिया निर्णय

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गुड्डू यादव
कासगंज 13 फरवरी 2018।
जिले में 128 वर्ष पूर्व बना अद्भुत जलसेतु झाल के पुल पर आज संकट के बादल मंडरा रहा रहे हैं। भूकंप के दौरान जलसेतु के टूटने की आशंका बनी हुई है। अगर इस कारण ये जल सेतु टूट जाता है तो कासगंज शहर सैलाब में बह जाएगा। फिलहाल सूचना मिलते ही कासगंज जिलाधिकारी ने एहतियात के तौर पर जलसेतु के ऊपर से चल रहे यातायात पर तत्काल रोक लगाने की बात कही है परंतु दर्शनार्थियों के लिए यह रोक नहीं है। भारी वाहन तो सदैव के लिए प्रतिबंधित कर दिए गए हैं।

आपको बताते चलें कि कासगंज जिले में नदरई गांव के समीप झाल का पुल सन् 1889 में बनकर तैयार हुआ था। इस जलसेतु के ऊपर हजारा नहर गुजरती है जबकि नीचे काली गंगा नदी बह रही है। इसकी पहचान विश्व के शीर्ष जलसेतुओं में है और झाल के पुल के नाम से जानी पहचानी जाती है।

यह जलसेतु आज से 128 साल पहले बनकर तैयार हुआ था। अब इसमें दरारें पड़ना शुरू हो गई हैं। हल्के भूकंप के दौरान पुल टूटने की संभावना जताई जा रही है। ऐसे में पूरा कासगंज शहर पानी के सैलाब में बह सकता है। आपको बताते चलें कि यह जलसेतु विश्व के तमाम शिक्षा संस्थानों के पाठ्यक्रम का हिस्सा भी है। इस जलसेतु की एंटिक फोटो, आयरलैंड की कॉर्क यूनिवर्सिटी से इंजीनियरिंग में स्नातक विलियम गुड ने नदरई जलसेतु को बनाने में अहम भूमिका निभाई थी। विलियम गुड इस परियोजना के कार्यकारी अभियंता थे। 60 फीट चैड़ाई की कुल 15 त्रिजाएं, जलसेतु की कुल लंबाई 1310 फीट और ऊंचाई 88 फीट है।नदरई का यह जल सेतु इंजीनियरिंग की एक ऐसी अग्रणी संरचना है, जिसकी पुनरावृत्ति करना आज के मशीनी युग में भी किसी चैलेंज से कम नहीं है।

हालांकि जिलाधिकारी आरपी सिंह ने इस झाल के पुल पर एहतियात के तौर पर भारी वाहनों को प्रतिबंध लगा दिया है जबकि दर्शनार्थियों के लिए आज भी मार्ग खुला हुआ है।

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