Friday, April 4, 2025
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बड़े ही दाना दिल थे बाबू सतीश चंद्र शोरा वाले

विजय गुप्ता की कलम से

 मथुरा। इस शहर में एक से बढ़कर एक दानवीर हुए हैं। एक दानवीर थे बाबू सतीश चंद्र शोरा वाले। ये महावर वैश्य समाज से थे। इनकी शोरा एवं वार्ली (छिले हुए जौ) की फैक्ट्री मसानी पर थी, जो आज भी है।
 ये न सिर्फ दानवीर थे बल्कि दरियादिली भी इनकी लाजवाब थी। एक दिन मेरी चर्चा नगर पालिका के पूर्व अध्यक्ष वीरेंद्र अग्रवाल जी से चल रही थी। उन्होंने अपना एक किस्सा, जो इनकी दानवीरता की जबरदस्त मिसाल है, मुझे सुनाया। वीरेंद्र जी बता रहे थे कि बहुत पुराने समय में शायद आधी शताब्दी पहले वे तथा स्व० श्री बांके बिहारी माहेश्वरी किसी प्रयोजन के लिए शहर भर से चंदा एकत्र कर रहे थे। जहां तक मेरा अंदाज है भारतीय जनसंघ पार्टी के लिए होगा।
 वीरेंद्र बाबू कहते हैं कि मैं तथा बांके जी शहर भर के धनवानों के द्वारे गए सभी ने यथाशक्ति चंदा दिया। किसी ने भी एक सौ एक रुपए से ज्यादा नहीं दिया। उस जमाने में एक सौ एक रुपए भी बहुत बड़ी रकम होती थी। वीरेंद्र जी कहते हैं कि हम दोनों इनकी फैक्ट्री पर पहुंचे तो सतीश बाबू और उनके दोनों छोटे भाई रमेश बाबू तथा ओम बाबू ने बड़ा सम्मान दिया आव भगत के बाद पूंछा कि आज हमारी फैक्ट्री पर कैसे आना हुआ?
 बांके जी और वीरेंद्र जी ने आने का प्रयोजन बताया तथा कहा कि इस कार्य में आपका सहयोग भी अपेक्षित है। इस पर सतीश बाबू बोले कि आज्ञा करें क्या सेवा की जाए? इस पर बांके जी ने वीरेंद्र जी की ओर देखते हुए कहा कि वीरेंद्र बाबू बताओ इनसे कितनी सेवा लेनी चाहिए? वीरेंद्र बाबू के मुंह से अचानक निकल गया कि पच्चीस सौ रुपए। इतना सुनते ही सतीश बाबू ने अपने मुनीम से कहा कि मुनीम जी इन्हें पच्चीस सौ रुपए दे दो।
 वीरेंद्र बाबू कहते हैं कि उनकी यह बात सुनते ही वे तथा बांके जी हक्के बक्के रह गए। वीरेंद्र बाबू ने मुझे बताया कि मैंने व बांके जी ने सतीश बाबू की दानवीरता के बारे में सुन तो रखा था किंतु ऐसी कल्पना भी नहीं की थी कि लगभग पचास वर्ष पहले जब पूरे शहर भर के दानदाताओं में एक सौ एक से आगे कोई बड़ा ही नहीं, तब सतीश बाबू बगैर किंतु परंतु किए एक ही झटके में पच्चीस सौ रुपए देने को तैयार हो जाएंगे। वे आगे कहते हैं कि मेरे दिमाग में यह चल रहा था कि कितना भी कम करेंगे तब भी दो ढाई सौ तो मिल ही जाएंगे उन्होंने कहा कि सतीश बाबू के कहते ही मुनीम ने पच्चीस सौ रुपए निकालकर हमारे सामने रख दिए।
 एक और घटना मुझे अपने बचपन की याद आ रही है। इस बात को भी लगभग छः दशक से अधिक का समय हो गया होगा। दिवाली वाले दिन या उससे एक दिन पहले की बात है। उस समय मिट्टी के लक्ष्मी गणेश पूरे शहर भर में सिर्फ होली गेट चौराहे पर ही बिका करते थे। चारों तरफ लकड़ी के तख्तों का जाल बिछ जाता और उन पर मिट्टी के लक्ष्मी गणेशों की तरह तरह की मूर्तियां सजी रहती थी, छोटी से छोटी बड़ी से बड़ी साथ ही एक से बढ़कर एक सुंदर भी। मैं भी घूम घूम कर पूरे इलाके में मूर्तियों को निहार रहा था। लक्ष्मी गणेश की एक जोड़ी जो राधेश्याम बीड़ी वालों की दुकान के आगे लगे एक तख्त पर सबसे ऊपर रखी हुई थी।
 वह जोड़ी अन्य सभी जोड़ियों से बड़ी तो अधिक थी ही किंतु इतनी सुंदर और आकर्षण थी कि जिसको देखो उसी की निगाहें वही टिक जातीं। लोग बड़े चाव से उसे देखते तथा कीमत पूंछ कर आगे बढ़ जाते क्योंकि उसकी कीमत बहुत अधिक थी। जहां तक मैं समझता हूं शहर भर के रईस लोगों ने उसे देखा होगा। मैं मन ही मन सोच रहा था कि इस मूर्ति को पता नहीं कौन भाग्यशाली खरीदेगा?
 बात आई गई हो गई किंतु कुछ माह बाद एक दिन में अपनी माताजी के साथ कोयला वाली गली स्थित इनके मकान पर गया, तो मैंने लक्ष्मी गणेश की उसी जोड़ी को इनके घर में देखा। दरअसल हमारी बड़ी बहन दिल्ली में ब्याही थीं। उनके घर में तो फोन था किंतु हमारे घर में फोन नहीं था। चूंकि इनके यहां हमारी दूरदराज की रिश्तेदारी थी अतः माताजी जीजी से बात करने के लिए इन्हीं के घर जाती थीं। तब मुझे एहसास हुआ कि ये तो बहुत बड़े आदमी हैं।
 एक और घटना जो बड़ी रोचक है, उसे भी बताता हूं। इनके यहां एक शाही तांगा था उस तांगे में जो घोड़ा जुतता था वह शहर का सबसे अच्छा घोड़ा था। एकदम काले रंग का और लंबा चौड़ा भी, जो भी देखता उसे देखता ही रह जाता। उसी तांगे से बाबूजी छत्ता बाजार जौहरी गली स्थित अपने राज महल जैसे मकान से सुबह फैक्ट्री जाते तथा शाम को घर आते। यह मकान उन्होंने शहर के नामी-गिरामी जौहरी श्यामा जड़िया से खरीदा था। मकान का तो नाम था किंतु था वास्तव में राजमहल जैसा पूरा का पूरा पत्थरों से बना हुआ।
 खैर अब आगे मुख्य मुद्दे पर आता हूं। एक बार रात के समय फैक्ट्री से वह घोड़ा चोरी हो गया। अब तो इनके घर में मातम सा छा गया, मातम कीमती घोड़े के चोरी होने की वजह से नहीं बल्कि इसलिए कि पूरा परिवार उस घोड़े को जी जान से प्यार करता था और घोड़ा भी सभी पर जान छिड़कता था। रास से ज्यादा आवाज की पहचान जानता था। जब कभी हमारी सड़क से गुजरता तो घर के सामने आते ही बिना रास खींचे ही रुक जाता क्योंकि पिताजी उसे कुछ न कुछ खिलाते थे। दरअसल बात यह थी कि आगे चलकर मेरी छोटी बहन अनीता की शादी सतीश बाबू के बड़े पुत्र अशोक जी से हो गई थी।
 अब आगे बढ़ता हूं घोड़े के चोरी होने के बाद खूब ढूंढ ढकोर हुई चारों तरफ डौंड़ी पिटवाई गई कि जो भी उस घोड़े की जानकारी देकर बरामदगी करायेगा उसे भरपूर इनाम दिया जाएगा किंतु कई दिन हो गए घोड़े का कोई अता पता नहीं लगा। इसके बाद बाबूजी ने किसी माध्यम के द्वारा उन लोगों से संपर्क किया जो चोरी के इस कार्य को करते थे। वे राजस्थान के डीग क्षेत्र के थे। बाबूजी ने घोड़े की जितनी कीमत थी उससे भी कहीं अधिक कीमत देने का ऐलान कर दिया। इसके बाद घोड़े का पता चल गया। फिर बिचौलियों के द्वारा भरपूर रकम घोड़ा चोरों के यहां पहुंचवाई गई तथा घोड़े को लेने बाबू जी के छोटे भाई स्व० श्री ओम प्रकाश जी स्वयं गए।
 घोड़ा चोरों ने मथुरा की सीमा से निकलते ही उनकी आंखों पर पट्टी बांध दी तथा लगभग एक घंटे बाद जब पट्टी खोली तो दूर खड़े घोड़े ने उन्हें पहचान लिया और बड़े जोर-जोर से हिनहिनाने लगा उसे देखकर ओम बाबूजी की आंखों में आंसू आ गए। बाद में फिर उनकी आंखों पर पट्टी बांधकर वापस मथुरा ले आया गया तथा कुछ देर बाद घोड़ा भी आ गया घोड़े के आते ही फैक्ट्री से लेकर घर तक खुशी का जो माहौल था, उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता।
 वैसे तो बाबू सतीश चंद्र शोरा वालों के अनेक दुर्लभ किस्से हैं किंतु एक और किस्सा जो हमारे परिवार से जुड़ा हुआ है बताए बगैर नहीं रहा जा रहा बात लगभग पचास वर्ष पुरानीं है। मेरी छोटी बहन की शादी बाबू जी के बड़े पुत्र अशोक जी से हुई थी, यह बात में पहले लिख चुका हूं किंतु उस समय जब घर पर बारात आई हुई थी एक बड़ी अजीबो-गरीब घटना घट गई। हुआ यह के फेरे हमारे घर में थे और बारात की दावत व्यवस्था घर के निकट भिवानी वाली धर्मशाला में थी। बारात कुछ अधिक लेट हो गई और जिन रिश्तेदारों के ऊपर बारातियों को जिमाने की जिम्मेदारी थी, उनमें से अधिकांश खिसक गए।
 इसका बुरा परिणाम यह हुआ कि अंतिम पंगत के समय जिमाने वालों का टोटा पड़ गया और खाने वाले मुंह देखें व परोसने वाला कोई नहीं। पिताजी व अन्य कुछ परिजन घर पर घिर गए दो चार लोग ही भिवानी वाली धर्मशाला में रह गए। समय भी आधी रात के काफी बाद का था शायद एक बजे का रहा होगा, मैं भी वहीं था। बेटी वाले की बात बिगड़े नहीं इस भावना से न सिर्फ बाबूजी बल्कि उनके दोनों छोटे भाई रमेश चंद्र जी व ओम प्रकाश जी तथा हमारी बहन के देवर जितेंद्र जी व विपिन जी आदि सभी घरवालों ने मोर्चा संभाल लिया तथा खुद बेटी वालों की तरह अपने हाथों से सभी को हंसी खुशी जिमाया।
 हमारे पिताजी व अन्य सभी परिजन इनकी इस महानता से नतमस्तक हो गए। यदि और कोई होता तो बखेड़ा खड़ा कर देता किंतु बाबू जी ने चूं तक नहीं की बारात में पूरे शहर की क्रीम थी। अंत में एक बात यह भी बताता हूं कि न सिर्फ बाबूजी शहर के नामी-गिरामी थे बल्कि उनकी ससुराल भी कम नामी-गिरामी नहीं थी। उनकी धर्मपत्नी श्रीमती बत्तो देवी मदन मोहन तेल मिल वालों की बेटी थीं। उस जमाने में मदन मोहन सुंदर लाल तेल मिल वाले जो घास की मंडी में थे, की बड़ी जबरदस्त हवा थी। हमारे पिताजी बताते थे कि उस जमाने में जब रमनलाल शोरावालों की तूती बोलती थी, ऐसा संयोग बना कि एक नहीं दो नहीं तीन तीन बार रमन टावर मदनमोहन सुंदरलाल के यहां गिरवी रखना पड़ गया था।
 इसमें कोई अनोखी बात नहीं समय का चक्र तो ऊपर नींचे सभी के साथ चलता रहता है। हमारे परिवार को भी ऐसी झटक झेलनी पड़ गयी थी। मूल बात यह है कि भले ही आज सतीश बाबू चन्द्र शोरा वाले नहीं हैं किंतु उनकी दाना दिली को पुराने लोग आज भी याद कर लेते हैं। सबसे बड़ी दाना दिली तो यह है कि हमारे जैसे मध्यम वर्गीय (उनके मुकाबले में तो बहुत गरीब हैं) परिवार की बेटी से अपने बड़े बेटे की शादी की। सिर्फ इसलिए कि हमारे पिताजी की भलमनसाहत से बाबूजी बहुत प्रभावित थे। आज मैं उनके चरणों में अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करके बड़ी सुखद अनुभूति महसूस कर रहा हूं। ईश्वर करे ऐसे दाना दिल हर शहर हर मोहल्ले और हर घर में जन्म लें।
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