मथुरा। कुछ दिन पहले की बात है। मेरे पास एक निमंत्रण पत्र जो मोटा ताजा है। कागजी थैले में रखकर आया। यह निमंत्रण पत्र बहुत पैसे वाले एक सज्जन के परिवार में होने वाले एक मांगलिक कार्यक्रम का था। थैले में रखकर अब तक तो कोई निमंत्रण पत्र आया नहीं, अब पहली बार मैंने देखा तो चौंक गया। अब तक तो सिर्फ लंबे चौड़े और भारी भरकम निमंत्रण पत्रों की स्पर्धा धनाढ्यो में चल रही थी, किंतु अब इनका आकार और भी तगड़ा करके थैलों में ब्याह शादी जनेऊ या अन्य मांगलिक कार्यों के कार्ड देने का नया चलन शुरू हो गया। मुझे तो लग रहा है कि आगे आने वाले समय में इन कार्डो का आकार और भी बढ़ जाएगा तथा ये ब्रीफकेस में रखकर बांटे जाएंगे।
हे भगवान यह सब क्या हो रहा है? इसे देखकर तो मुझे ऐसा लगता है कि डालमिया फार्म हाउस में हुए सैकड़ो हजारों पेड़ों के कत्ल में जो एफ आई आर दर्ज हुई है उसमें यह लोग भी नामजद होने चाहिए। कुछ लोग मेरी इस बात को मूर्खता कहेंगे किंतु इन मोटे-मोटे फैंसी कार्डो की खूबसूरती के पीछे कितनी क्रूरता छुपी है यह सोचने की बात है। इन कागजों के निर्माण की पृष्ठभूमि में उझकने से पता चलता है कि यह सब हरे भरे पेड़ों की कटान यानी हत्या का मामला है। जितना ज्यादा और जितनी बढ़िया क्वालिटी के कागजों का इस्तेमाल होगा उतनीं ही अधिक पेड़ों की हत्याएं होगी।
चाहे ब्याह शादी, जनेऊ या अन्य किसी भी प्रकार के निमंत्रण पत्र हों या मिठाई के डिब्बे हों अथवा अन्य किसी भी प्रकार के कागज गत्ता आदि इन सभी का अनावश्यक यानी व्यर्थ का उपयोग हम सभी को हत्यारों की श्रेणी में लाकर खड़ा कर रहा है। मैं जिस कागज पर लिखता हूं बाद में उसी के पीछे भी लिखकर उसका भरपूर उपयोग करके ही रद्दी मानता हूं। हमारे यहां जो मिठाई बाजार से आती है उसके लिए घर से बर्तन भेज कर मंगाई जाती है। हालांकि दुकानदार बड़े आश्चर्यचकित होते हैं कि यह कैसा अजीब ग्राहक है? मिठाई ही क्या अन्य वस्तुओं में भी यथासंभव अपना वारदाना (बर्तन थैला) भेजकर उसमें सामान मंगाया जाता है। इससे मेरे मन को बड़ी तसल्ली या यौं कहें कि शांति मिलती है। एक और तो पेड़ों की रक्षा का ढिंढोरा पीटा जाता है और दूसरी ओर हर कोई करनी ऐसी करने में लगा हुआ है कि ज्यादा से ज्यादा पेड़ों का कटान हो। यह पेड़ भी जीव हैं।
लिखते लिखते मुझे परम पूज्य देवराहा बाबा की वह बात याद आ रही है जब उनकी मचान के पास पेड़ की एक बड़ी डाली को कटने से बचाने की खातिर उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व• राजीव गांधी का कार्यक्रम स्वयं ही रद्द कर दिया। बात यह थी की सुरक्षा अधिकारियों ने उनकी मचान के पास लगे विशाल पेड़ की एक बड़ी डाली सुरक्षा के कारण से कटवाना चाहा ताकि दूर से बाबा और राजीव गांधी पर नजर बनी रहे। बाबा को जब यह बात पता चली तो उन्होंने साफ मना कर दिया और कहा कि यह पेड़ तो हमारा मित्र है, हम इससे रोजाना बतियाते हैं, किंतु सुरक्षा अधिकारी सुरक्षा की बात कह कर बाबा से बार-बार पेड़ की डाली कटवाने की मिन्नत करने लगे जो बाबा को अच्छा नहीं लगा। बाबा ने उनसे कह दिया कि अच्छा तो मैं तुम्हारे प्रधानमंत्री का कार्यक्रम ही निरस्त किए देता हूं। इसके कुछ देर बाद ही दिल्ली से रेडियो ग्राम आ गया कि प्रधानमंत्री का कार्यक्रम फिलहाल टाल दिया गया है।
इसके कुछ दिन बाद राजीव गांधी पूज्य देवराहा बाबा का आशीर्वाद लेने आये किंतु पेड़ की डाली नहीं काटी गई। कहने का मतलब है कि इन वृक्षों की हत्या के घोर पाप से बचने के लिए हमें अनावश्यक रूप से कागजों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। भले ही ब्याह शादी या अन्य किसी आयोजन के निमंत्रण पत्र हों मिठाई या अन्य सामान में डिब्बों अथवा तमाम तरह की वस्तुओं की अनावश्यक पैकिंग ही क्यों न हो। कागज के अलावा गत्तों का भी अधिक प्रयोग बहुत गलत है क्योंकि गाय भैंस आदि पशुओं के खाने वाला भूसा इस कार्य में इस्तेमाल किया जाता है। फलस्वरुप भुस की कीमत आसमान छू रही है और पशुओं को अच्छी क्वालिटी का भूसा नसीब नहीं होता।
अब इस बारे में ज्यादा कुछ कहने की आवश्यकता नहीं समझदार को तो इशारा ही बहुत होता है। मैंने तो अपनी मोटी बुद्धि के हिसाब से बहुत कुछ लिख दिया है। बाकी जिसकी जैसी मर्जी हो करे। करोगे तो आपको माई को न बाप को। जैसा करोगे वैसा भरोगे अर्थात जैसा बोओगे वैसा काटोगे। करनी करे तो क्यों करे करके क्यों पछताय बोऐ पेड़ बबूल के तो आम कहां से खाय। अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गईं खेत। यानी अंत में सिवाय हाथ मलाने के अलावा और कोई चारा बाकी नहीं रहेगा बाकी रहेगा तो सिर्फ मलाल।